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मकर संक्रांति पर कविता | Makar Sankranti Poem in Hindi

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मकर संक्रांति पर कविता – Makar Sankranti par Kavita | Makar Sankranti Poems

मकर संक्रांत एक त्योहार हिंदू धर्म मे सबसे पहला त्योहार माना जाता है क्यूकी इंग्लिश महिनो के मुताबित ये त्योहार पेहला त्योहार होता है | इस दिन सुबह सुबह सभी लोग एक दुसरे को हॅपी मकर संक्रांती बोलते है और इस दिन काले रंग के कपडे पहने जाते है | और महिला एक दुसरे को हळदी कुंकू देते है और उसके साथ गिफ्ट भी देते है | अब मैंने आपको मकर संक्रांति क्या होती है बता दिया है अब हम मकर संक्रांति के ऊपर कविता देखने वाले है ये कविता आपको आपके फ्रेंड्स फॅमिली को भेजने के लिए काम आयेगी आज की हमारे पोस्ट को सुरुवात करते है

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जन पर्व मकर संक्रांति आज
उमड़ा नहान को जन समाज
गंगा तट पर सब छोड़ काज।

नारी नर कई कोस पैदल
आरहे चले लो, दल के दल,
गंगा दर्शन को पुण्योज्वल!

लड़के, बच्चे, बूढ़े, जवान,
रोगी, भोगी, छोटे, महान,
क्षेत्रपति, महाजन औ’ किसान।

दादा, नानी, चाचा, ताई,
मौसा, फूफी, मामा, माई,
मिल ससुर, बहू, भावज, भाई।

गा रहीं स्त्रियाँ मंगल कीर्तन,
भर रहे तान नव युवक मगन,
हँसते, बतलाते बालक गण।

अतलस, सिंगी, केला औ’ सन
गोटे गोखुरू टँगे, स्त्री जन
पहनीं, छींटें, फुलवर, साटन।

बहु काले, लाल, हरे, नीले,
बैगनीं, गुलाबी, पट पीले,
रँग रँग के हलके, चटकीले।

सिर पर है चँदवा शीशफूल…

सिर पर है चँदवा शीशफूल,
कानों में झुमके रहे झूल,
बिरिया, गलचुमनी, कर्णफूल।

माँथे के टीके पर जन मन,
नासा में नथिया, फुलिया, कन,
बेसर, बुलाक, झुलनी, लटकन।

गल में कटवा, कंठा, हँसली,
उर में हुमेल, कल चंपकली।
जुगनी, चौकी, मूँगे नक़ली।

बाँहों में बहु बहुँटे, जोशन,
बाजूबँद, पट्टी, बाँक सुषम,
गहने ही गँवारिनों के धन!

कँगने, पहुँची, मृदु पहुँचों पर
पिछला, मँझुवा, अगला क्रमतर,
चूड़ियाँ, फूल की मठियाँ वर।

हथफूल पीठ पर कर के धर,
उँगलियाँ मुँदरियों से सब भर,
आरसी अँगूठे में देकर

वे कटि में चल करधनी पहन…

वे कटि में चल करधनी पहन,
पाँवों में पायज़ेब, झाँझन,
बहु छड़े, कड़े, बिछिया शोभन,

यों सोने चाँदी से झंकृत,
जातीं वे पीतल गिलट खचित,
बहु भाँति गोदना से चित्रित।

ये शत, सहस्र नर नारी जन
लगते प्रहृष्ट सब, मुक्त, प्रमन,
हैं आज न नित्य कर्म बंधन!

विश्वास मूढ़, निःसंशय मन,
करने आये ये पुण्यार्जन,
युग युग से मार्ग भ्रष्ट जनगण।

इनमें विश्वास अगाध, अटल,
इनको चाहिए प्रकाश नवल,
भर सके नया जो इनमें बल!

ये छोटी बस्ती में कुछ क्षण
भर गये आज जीवन स्पंदन,
प्रिय लगता जनगण सम्मेलन।

मकर संक्रांति (कविता)

  1. आज का दिन है अति पावन
    मकर संक्रांति का है दिन
    आज उड़ेगी आकाश में पतंग
    होंगे लाल पिले सब रंग
    गंगा में डुबकी लगाओ
    करो शीतल तन और मन
    दान करो चीनी चावल धान
    कमाओ पुण्या बनाओ परमार्थ
    जोड़ो हाथ ईशवर से वर माँगो
    सब जन जीवन का हो कल्याण
  2. हर्षोल्लास,सद्दभाव,शांतिअति पावन है ये दिनदेश के हर हिस्से में

    रूप नाम से भिन्न

    गंगा में डुबकी लगा

    करते हैं स्नान

    बड़े ही सम्मान से

    करते दान,दक्षिणा,मान

    जिसकी जो भी इच्छा है,

    है जितनी सामर्थ्य

    आज सभी करते हैं पुण्य

    पाने को परमार्थ

    गुड़ तिल लड्डू

    गजक, मूंगफली

    उत्तरायन की हवा

    चल पड़ी

    कहीं संक्रांति, कहीं है पोंगल

    कहीं बन रही है खिचड़ी

    लाल, हरी और नीली पीली

    जाने कितनी रंग बिरंगी

    फिरकी और पतंग माझे से

    आसमान भी है अतरंगी

    चारों दिशाओं में बादल जैसे

    इन्द्रधनुष से हैं सतरंगी

    मौसम हर पल रंग बदलता

    छाई है एक अगल उमंग

    ढील,छोड़, काटो और पकड़ो

    दौड़ो लूटो कहे पतंग

    खुशियों के इस महापर्व में

    उनको भूल ना जाना जिनका

    आसमान में ही है घर

    हम सबकी है ज़िम्मेदारी

    दोस्त हमारे हैं नभचर

    सभी के बीच रहे प्यार व्यवहार

    मुबारक हो मकर संक्रान्ति का त्योहार

    Short Poem on Makar Sankranti in Hindi

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